Tuesday, 9 January 2018

चिराग

ढल रही सांझ के मानिंद
मंद पड़ती जाती है
मेरी उम्मीदों के चिरागों की लौ,..
और ठीक तभी
दूर ही सही
तुम्हारी मौजूदगी
महसूस होती है
रात के अंधेरे में
बादलों की मचान पर छुपे
चाँद की तरह,
जो निकले या न निकले
अमावस को
पर हर पूर्णिमा को निकलेगा ही,...

और
सुबह जब भी सूरज आएगा
रोशनी के बाद भी
अंधेरों के फिर आने के
डर को परे धकेलकर
मेरे चाँद के हमेशा साथ होने का यकीन
जिंदा रखेगा
मेरी उम्मीदों के चिरागों को,...

हाँ !
मेरी जिंदगी में रोशनी का अर्थ
सिर्फ तुम हो
सूरज की तरह तप्त रोशनी नहीं
तुम्हारे साथ कि स्निग्ध शीतलता
रखती है मुझमें
जिन्दा रहने का हौसला,
अमावस से पूर्णिमा तक,...

सुनो!!!
ग्रहण के अपवाद में भी
कायम रखोगे न
विश्वास मेरा,.... प्रीति सुराना

*पहचान*

रात देर तक खिड़की के पास खड़ी रही, आज चाँद को नहीं बल्कि टूटते हुए तारे को देखती रही मृदुला तब तक, जब तक टूटा हुआ हिस्सा ब्रम्हतत्व में विलीन नहीं हो गया।
सुबह कुछ विचलित, अनमनी और उदास सी मृदुला को देखकर आकाश ने पूछ ही लिया, क्या बात है ''मृदु तुम खुश नहीं हो मेरे साथ ?''
जवाब देने की बजाय मृदुला ने पलट कर सवाल कर लिया "आशु तुम सच में मुझसे प्यार करते हो?"
आकाश ने कहा तुम्हारे इसी सवाल से मुझे डर लगता है, तुम ही बता दो कि तुम्हें यकीन दिलाने के लिए मुझे क्या करना होगा, मेरी समझ में तो नहीं आता कि मुझे क्या करना चाहिए?
मृदुला ने डरते हुए धीरे से कहा कुछ मत करो, बस कुछ पल बेसमय, बेवजह मुझे अपनी बाहों में ले लो। पर दूसरे ही पल देखा तो आकाश बिना सुने नहाने जा चुका था।
मृदुला ने उसका टिफिन तैयार किया, और टेबल पर नाश्ता लगा दिया।
आकाश जल्दी से नाश्ता करके ऑफिस के लिए निकलते हुए, मृदुला को अपना ध्यान रखने की हिदायत देता हुआ 'आई लव यू मृदु' बोलकर निकल गया।
मृदुला कहना चाहती थी ''आशु मैं भी तुमसे बहुत ज्यादा प्यार करती हूं" पर किससे कहती उसके जवाब की प्रतीक्षा किसे थी? शब्दों और भावों को मन में दबाए पूरा दिन फिर रात, अंधेरो, चाँद और टूटते तारों की प्रतीक्षा में गुजारना था।
अब तारों के टूटे हुए अस्तित्वहीन हिस्से में ही उसे अपनी *पहचान* महसूस होती है उन तारों में नहीं जो कभी आशु की पसंद हुआ करते थे ।


Wednesday, 3 January 2018

प्रेम तलाशता *मेरा मन*

*मेरा मन*

चहुँ ओर

ईर्ष्या-द्वेष
छल-कपट
झूठ-फरेब
संदेह-कलह
दंभ-आक्रोश
आरोप-प्रत्यारोप
प्रतिद्वंदिता-प्रतिस्पर्धा

इन सब के बीच
कतरा-कतरा
विश्वास-अपनापन
कर्तव्यपरायणता-समर्पण
और
प्रेम तलाशता

*मेरा मन*

प्रीति सुराना

Sunday, 31 December 2017

विदा 2017 स्वागत 2018

यादों के समंदर को रीता करूं तो कैसे?
बीते लम्हों को खुद से जुदा करुं तो कैसे?
सुख-दुख, हार-जीत, मिलन-विछोह के साक्षी
ए जाते हुए साल तुम्हें विदा करुं तो कैसे?

विदा 2017 स्वागत 2018

प्रीति सुराना
31/12/2017

स्वागत 2018

पलों, घंटों या दिनों का हिसाब नहीं है मेरे पास
मन का हाल लिखा हो जिसमें वो किताब नहीं है मेरे पास
भीड़ में तन्हा रहकर क्या खोया, क्या पाया अब तक,
तुम्हारे इन सवालों का कोई जवाब नहीं है मेरे पास,....

प्रीति सुराना


प्रथम अधिकार

हाँ! मुझे नई संभावनाओं और अपने सपनों से प्यार है,
पर भावनाओं की गोद में पलता मेरे सुख-दुख का संसार है,
अपने स्वाभिमान पर कोई ठेस मुझे कतई स्वीकार नहीं,
मेरी निश्चल भावनाओं का सम्मान मेरा प्रथम अधिकार है।

प्रीति सुराना

Saturday, 30 December 2017

मेरा सपना

सुनो!
कभी जिंदगी ने धोखा दिया
और छूट गया तुम्हारा हाथ
रुक गई मेरी सांसे
और न रह सके हम साथ
तो गुजारिश मेरी
पूरा करना हर वो सपना
जो बसता है इन दिनों
तुम्हारी आँखों में
क्योंकि
मेरे सपने के
मुक्कमल होने का
सिर्फ एक यही रास्ता है।
जानते हो
मेरा सपना क्या है?
मेरा सपना है
तुम्हारी आँखों मे पलते
सपनों का पूरा होना,.
फिर चाहे मेरे साथ
या फिर
मेरे बाद,...
बोलो!
तुम करोगे न
मेरा सपना पूरा???

प्रीति सुराना

Friday, 29 December 2017

मेरी जरूरत नहीं है

बहाने बनाने की मुझको आदत नहीं है,
और मेरा प्यार इतना भी बेगैरत नहीं है,
चली जाती चुपचाप जिंदगी से मैं तुम्हारी,
एक बार कह तो देते मेरी जरूरत नहीं है।

प्रीति सुराना

पत्थर-सा

धीरे-धीरे अपने मन को पत्थर सा कर लिया है,
नसीब में जो भी लिखा है वो मंजूर कर लिया है,
प्यार, एतबार,इख़्तियार मेरे नहीं, सिर्फ दर्द मेरे हैं,
और अब हर दर्द से मैंने समझौता कर लिया है।

प्रीति सुराना

मैं रो दूंगी

क्या है मेरे पास जो किसी को दूंगी
कुछ नहीं है मेरा जिसे मैं खो दूंगी,
समझौता कर लिया हालात से मैंने
अब मेरे हाल पूछोगे तो मैं रो दूंगी।

प्रीति सुराना

समझौते

अपने हालातों से कई समझौते किये,
रास्ते और रिश्तों को नए आयाम दिए,
हकीकत से सपनों की सुलह करवाई,
तब जाकर जिंदगी के कुछ लम्हे जिये।

*प्रीति सुराना*

Wednesday, 27 December 2017

मैं जल सी,..( कुछ मुक्तक)

मैं बहती ही रही हूं जल सी सदा
पत्थरों ने निभाई अपनी भूमिका
रोकने को रास्ते थे खड़े हर जगह
धाराओं में बंटी पर न बहना रुका

किसी को मुझसे न लगे चोट कोई
नीयत में कभी न आए खोट कोई
जल सी पारदर्शिता रहे मुझमें कायम
मलिनता न हो मुझमें शामिल कोई

चपलता, चंचलता और संजीदगी
नदी सी हमेशा मुझमें कायम रही
बांधने को बांध तत्पर रहे लोग लेकिन
अभियंता ही रहे वो मेरे नियंता नहीं

मैं जल हूँ नदी का बस ये जान लो
हो सके तो फितरत भी पहचान लो
समर्पण है पूंजी और मेरा आत्मबल
मिलूंगी बस सागर से ही मान लो

मेरी राह में जो भी पत्थर बने
फौलादी है इरादे मेरे मान लें
सागर है मंजिल मेरी जिंदगी की
टूटकर भी बहूँगी सभी जान लें।

प्रीति सुराना

कोहरा

ऐसा नहीं है कि मेरे जीवन में खुशियां नहीं है
मौसम ही ऐसा है कि थोड़ा कोहरा थोड़ी नमी है
आएगा एक दिन सूरज लेकर रोशनी भी
लेकिन ये सच है इक तुम्हारी ही कमी है

प्रीति सुराना

धुंधलके

दर्द के धुंधलके छटेंगे जरूर
खुशियों के नज़ारे दिखेंगे जरूर
जरूरत जरा से प्यार की है
प्यार की आंच से गम कटेंगे जरूर,...

प्रीति सुराना

कुहासे

गर्दिशों में छुपे हैं अभी किस्मत के सितारे,
उम्मीद की नन्ही किरण हो तुम  हमारे,
हाँ! रास्ता है अभी तो *कुहासों* से भरा,
पर हिम्मत है कायम इक तुम्हारे सहारे,...

प्रीति सुराना


इख़्तियार

तुझ पर यकीन करके तेरे प्यार में
इक तेरी उम्मीद में तेरे इंतज़ार में
जी रही हूं पल पल सांसें गिन-गिन
पर धड़कनों को कैसे रखूं इख़्तियार में,..

प्रीति सुराना



Tuesday, 26 December 2017

प्रतिक्रिया


प्रतिक्रिया
         पिछले कई दिनों से महसूस कर रहा था यश कि उसके और आरोही के बीच की कहा-सुनी लगभग खत्म हो गई है।
         रोज सुबह नाश्ते पर दोनों साथ होते हैं, इसके बाद यश ऑफिस निकल जाता और ऑफिस दूर होने के कारण सीधे रात को घर लौटता।
          मुम्बई जैसे बड़े शहर में दूर दराज कहीं सुनसान जगह पर कंपनी से मिला फ्लैट सभी सुविधाओं से युक्त था पर छोटी सी भी चीज घर की जरूरत की चाहिए हो तो शहर तक जाकर लेन में आधा दिन गुजर जाता। पूरा दिन आरोही अकेले पड़े रहकर हर बात के लिए यश पर निर्भर होती चली गई। पास-पड़ोस में गिनेचुने लोग जिनके चेहरे भी यदा-कदा की देखने को मिलते।
           देर रात लौटा यश इतना थका हुआ होता कि चुपचाप खाना खाकर सो जाता। यश और आरोही के बीच वार्तालाप का समय होता सुबह-सुबह प्यार से यश को जगाने से लेकर टिफिन देकर ऑफिस भेजने तक।
          ऐसे में आरोही के पास नाश्ते की टेबल ही एकमात्र जगह होती जहां वो घर की जरूरतें, और कुछ मन की बातें और अपना अकेलापन यश से कह पाती। पर धीरे-धीरे यश खीझने लगा, अकसर बात इस वाक्य के साथ खत्म होता कि मेरे पास समय नहीं रोज-रोज तुम्हारा रोना, तुम्हारी शिकायतें दूर करना मेरे बस की बात नहीं।
            ऐसा नहीं कि यश आरोही से प्रेम नहीं करता। पर बहुत अजीब था कि जब प्रेम उमड़े उसे आरोही से अपेक्षा होती कि वो उसपर दुगना प्रेम उढ़ेले पर जब वह चिढ़ता या नाराज होता तब उसे कतई बर्दाश्त नहीं होता कि आरोही कोई भी प्रतिक्रिया दे।
          धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अनुबंध सा हो गया। आरोही हर खुशी में हंसकर शामिल होती पर यश के क्रोध से बचने के लिये अपनी जरूरतों और भावनाओं को दबा लेती।
          नाश्ते की टेबल की कहा-सुनी तो बंद हो गई पर आरोही के भीतर जीवन का उत्साह कम होने लगा। यश से संवाद सिर्फ उतना ही होता जितना यश चाहता।
          आज दोनों के बीच पसरे सन्नाटे, और आरोही के मुरझाए चेहरे को देख बरबस ही यश के मन मे हलचल मच गई। दिनभर यश का मन काम में नहीं लगा। न चाहते हुए भी आरोही उसके जेहन में बार-बार आती रही। और धीरे - धीरे उसे आरोही की पीड़ा समझ आने लगी। और वो ये भी समझ गया कि समस्या क्या है।
       हर क्रिया की प्रतिक्रिया जरूरी है। प्रेम के बदले प्रेम चाहिए पर गुस्से की कोई प्रतिक्रिया न सह पाना ही यश की कमजोरी थी जो दोनों के बीच पसरी दूरी का कारण थी। अब यश ने तय कर लिया था वो खुद को बदलेगा, और कहने जे साथ सुनने की आदत भी डालेगा।
         बहुत थोड़े से प्रयास के बाद ही यश आरोही के मन तक फिर से पहुंच गया। रोज सुबह हंसी-खुशी और नोकझोंक अब पहले से अधिक होने लगी। और इस बदलाव की प्रतिक्रिया ये हुई कि अब दोनों अपने सूने घर में नन्हें कदमों से आने वाली खुशियों का इंतजार कर रहे हैं।
           दोनों के प्रेम और समर्पण का ही परिणाम है कि अब यश और आरोही सचमुच हर सुख-दुख के साझेदार और सच्चे जीवनसाथी बनकर अपनी जीवन बगिया को संवार पाए।

प्रीति सुराना