Wednesday, 30 March 2016

ठहराव


सुन रे मन !!
किसी ठहरी हुई नदी का तट देखना,..
कितना मलीन कुड़े करकट से भरा,..
कोई इसका प्रयोग तो क्या
इसके समीप भी कैसे जाता होगा??

पर सच
पशु ही नहीं अपितु विवश मानव भी
करते हैं प्रयोग इस मलीन जल और स्थल का ,..
स्नान,निवृत्ति ,सिंचाई 

और मलिनता को विसर्जित करने के लिए...

पर कभी सोचा
ये मलिनता यहां एकत्रित क्यों है????
वजह है
एक ठोस वजह है
"ठहराव"

अगर यह तट ढलान में होता
तो यक़ीनन जल की तरलता
उसे बहते रहने को बाध्य करती
और बह जाती सारी गंदगी
बहते जल के साथ,...

माना
नदी को
बांधा जाता है
बांधो से,..
सेतुओं से,..

पर
बांध सिर्फ इसलिए
ताकि ढलान को सही दिशा देकर
नदी के बहाव को
नियंत्रित कर सके,...

और
सेतू सिर्फ इसलिए
ताकि नदी के किनारे जो सामानांतर बहते हैं
वो एक दूसरे से संबद्ध रहकर 

एकता और सद्भावना हेतु जुड़ाव का प्रतीक बने,..

सुन मन
जब प्रकृति इतने सन्देश देती है
तो कदाचित उपजे दुःख से ठहर मत,..
चलता जा अपनी नैतिकता के बांधों से परिमित होकर..
और जुड़ा रह अपने अपनों से प्रेम के सेतु से बंधकर,..

यकीन कर
ठहराव से
एकत्रित मलिनता
पल में होगी
प्रवाहित,..

सच
जियो तो
स्वछंदता से मुक्त
स्वतंत्र और संयमित
नदी की तरह,...

वरना
निश्चित है
ठहराव से 'मलिनता'
और
असंयम से 'सैलाब',..

रे मन अब तू ही चुन ले
राह कौन सी तेरी हो
समय अभी है सोच ले
प्रमाद से न फिर देरी हो,... प्रीति सुराना

5 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31 - 03 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2298 में दिया जाएगा
    धन्यवाद 

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  2. उम्दा लेखन .. शुभ दोपहरी jsk :)

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  3. सही कहा ठहराव से मलिनता और असंयम से सैलाब। बहना ही जीवन है कल कल छल छल।

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